अंगावर कसे शहारे येतात,
जुन्या आठवणी सजवताना.
खरी कसरत तेव्हाच होते,
डोळ्यातील आश्रु लपवताना.
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आठवण एक प्रवाह आहे,
हवे तसे वळवता येते.
दु:खद आठवणीसह रडता रडता,
सुखद आठवणीसह हासता येते.
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ढगांमधुन गडगडणारी भुतकाळाची आरोळी,
अंगणात सजलेली स्मरणांची रांगोळी,
मनात साठवलेले जुने चार क्षण जोडले,
अन तयार झाली हि आठवणींची चारोळी....
------------------------------------------------००० धनेष ०००---